श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 110-111
 
 
श्लोक  3.7.110-111 
नित्य आमार एइ सभाय हय कक्षा - पात ।
एक - दिन उपरे यदि हय मोर बात् ॥110॥
“तबे सुख हय, आर सब लज्जा याय ।
स्व - वचन स्थापिते आमि कि करि उपाय ?” ॥111॥
 
 
अनुवाद
"इस सभा में मैं हर दिन हारता हूँ। अगर संयोग से किसी दिन मैं जीत भी गया, तो मेरे लिए बहुत खुशी की बात होगी, और मेरी सारी शर्म दूर हो जाएगी। लेकिन मैं अपने बयानों को पुष्ट करने के लिए क्या उपाय अपनाऊँ?"
 
"I am defeated every day in this assembly. If I were to triumph some day, it would be a great source of joy to me and all my shame would vanish. But what means should I adopt to establish my position?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)