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श्लोक 3.7.109  |
शुनिया वल्लभ - भट्ट हैल निर्वचन ।
घरे याइ’ मने दुःखे करेन चिन्तन ॥109॥ |
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| अनुवाद |
| यह सुनकर वल्लभ भट्ट अवाक रह गए और अत्यंत दुखी होकर घर लौट आए और इस प्रकार विचार करने लगे। |
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| Hearing this, Vallabh Bhatta became speechless. He returned home deeply saddened and began to reflect on this. |
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