श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.7.1 
चैतन्य - चरणाम्भोज - मकरन्द - लिहो भजे ।
येषां प्रसाद - मात्रेण पामरोऽप्यमरो भवेत् ॥1॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तों को मेरा सादर प्रणाम। उनके चरणकमलों से मधुपान करने वाले भक्तों की अहैतुकी कृपा मात्र से पतित आत्मा भी सदा के लिए मुक्त हो जाती है।
 
I offer my respectful obeisances to the devotees of Sri Chaitanya Mahaprabhu. Even a fallen soul is liberated forever by the causeless grace of devotees engaged in licking the honey from the Lord's lotus feet.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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