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श्री चैतन्य चरितामृत
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अध्याय 6: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रघुनाथ दास गोस्वामी की भेंट
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श्लोक 68
श्लोक
3.6.68
कोन कोन विप्र उपरे स्थान ना पाञा ।
दुइ होल्नाय चिड़ा भिजाय गङ्गा - तीरे गिया ॥68॥
अनुवाद
कुछ ब्राह्मणों को मंच पर स्थान न मिलने पर वे अपने दो मिट्टी के बर्तन लेकर गंगा तट पर चले गए और वहां अपने चावल भिगो दिए।
Some Brahmins who could not find a place on the platform, took two earthen pots each and went to the banks of the Ganga and soaked their chiura there.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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