श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 6: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रघुनाथ दास गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.6.35 
एइ - मत रघुनाथेर वत्सरेक गेल ।
द्वितीय वत्सरे पलाइते मन कैल ॥35॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार रघुनाथदास ने एक वर्ष तो प्रथम श्रेणी के व्यापारी की भाँति व्यतीत किया, किन्तु अगले वर्ष उन्होंने पुनः घर छोड़ने का निश्चय कर लिया।
 
In this way Raghunath Das spent a whole year as a good business manager, but the next year he decided to leave home again.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd