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श्लोक 3.6.35  |
एइ - मत रघुनाथेर वत्सरेक गेल ।
द्वितीय वत्सरे पलाइते मन कैल ॥35॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार रघुनाथदास ने एक वर्ष तो प्रथम श्रेणी के व्यापारी की भाँति व्यतीत किया, किन्तु अगले वर्ष उन्होंने पुनः घर छोड़ने का निश्चय कर लिया। |
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| In this way Raghunath Das spent a whole year as a good business manager, but the next year he decided to leave home again. |
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