श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 6: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रघुनाथ दास गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.6.33 
याह तुमि, तोमार ज्येठारे मिलाह आमारे ।
ये - मते भाल हय करुन, भार दि लुँ ताँरे ॥33॥
 
 
अनुवाद
"अब तुम जाओ और मेरे और अपने चाचा के बीच एक मुलाक़ात तय करो। उन्हें जो ठीक लगे, करने दो। मैं पूरी तरह से उनके फ़ैसले पर निर्भर रहूँगा।"
 
"Now go and arrange a meeting between me and your uncle. He can do whatever he thinks is best. I will be completely dependent on his decision."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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