श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 6: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रघुनाथ दास गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 326
 
 
श्लोक  3.6.326 
आपन - उद्धार एइ रघुनाथ - दास ।
‘गौराङ्ग - स्तव - कल्प - वृक्षे’ करियाछेन प्रकाश ॥326॥
 
 
अनुवाद
गौरांग-स्तव-कल्पवृक्ष नामक अपनी कविता में रघुनाथ दास ने अपने व्यक्तिगत उद्धार का वर्णन किया है।
 
Raghunath Das has described his salvation in his poem titled 'Gaurangastavakalpavriksha'.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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