श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 6: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रघुनाथ दास गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 324
 
 
श्लोक  3.6.324 
प्रभु बले, - “निति - निति नाना प्रसाद खाइ ।
ऐछे स्वाद आर कोन प्रसादे ना पाइ” ॥324॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "निःसंदेह, मैं प्रतिदिन विभिन्न प्रकार के प्रसाद खाता हूँ, किन्तु मैंने कभी भी इतना अच्छा प्रसाद नहीं चखा, जितना रघुनाथ जी खा रहे हैं।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, “Of course, I eat various kinds of prasada every day, but I have never eaten such excellent prasada as Raghunath is eating.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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