श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 6: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रघुनाथ दास गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 320
 
 
श्लोक  3.6.320 
स्वरूप कहे , - “ऐछे अमृत खाओ निति - निति ।
आमा - सबाय नाहि देह’, - कि तोमार प्रकृति?” ॥320॥
 
 
अनुवाद
स्वरूप दामोदर बोले, "आप प्रतिदिन ऐसा अमृत खाते हैं, पर हमें कभी अर्पित नहीं करते। आपका चरित्र कैसा है?"
 
Svarupa Damodara said: "You eat such nectar every day, but you never give it to us. What is your nature?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)