श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 6: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रघुनाथ दास गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 315
 
 
श्लोक  3.6.315 
प्रसादान्न पसारिर यत ना विकाय ।
दुइ - तिन दिन हैले भात सड़ि’ याय ॥315॥
 
 
अनुवाद
भगवान जगन्नाथ का प्रसाद दुकानदारों द्वारा बेचा जाता है, और जो नहीं बिकता वह दो या तीन दिन बाद सड़ जाता है।
 
The offerings to Lord Jagannath are sold by shopkeepers. Anything that doesn't get sold rots after two or three days.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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