श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 6: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रघुनाथ दास गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 314
 
 
श्लोक  3.6.314 
आत्मानं चेद्विजानीयात्परं ज्ञान - धुताशयः ।
किमिच्छन्कस्य वा हेतोर्देहं पुष्णाति लम्पटः ॥314॥
 
 
अनुवाद
"यदि किसी का हृदय पूर्ण ज्ञान से शुद्ध हो गया है और उसने परम ब्रह्म कृष्ण को समझ लिया है, तो उसे सब कुछ प्राप्त हो जाता है। ऐसा व्यक्ति अपने भौतिक शरीर को बहुत सावधानी से पालने का प्रयास करके व्यभिचारी की तरह क्यों व्यवहार करे?"
 
"If one's heart has been purified by perfect knowledge and one has understood the Supreme Being, Krishna, then one has attained everything. Why should such a person act like a lecherous person, trying to nourish his material body well?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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