श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 6: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रघुनाथ दास गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 284
 
 
श्लोक  3.6.284 
प्रभु कहे, - “भाल कैल, छाड़िल सिंह - द्वार” ।
सिंह - द्वारे भिक्षा - वृत्ति - वेश्यार आचार ॥284॥
 
 
अनुवाद
यह समाचार सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु बोले, "सिंहद्वार पर खड़े न रहकर उन्होंने बहुत अच्छा किया। इस प्रकार भिक्षा माँगना वेश्या के समान है।"
 
Hearing this news, Sri Chaitanya Mahaprabhu said, "He did well to stop standing at the Lion Gate. Such begging is like the behavior of a prostitute."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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