श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 6: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रघुनाथ दास गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 279
 
 
श्लोक  3.6.279 
विषयीर अन्न ह य ‘राजस’ निमन्त्रण ।
दाता, भोक्ता - दुँहार मलिन हय मन ॥279॥
 
 
अनुवाद
“जब कोई व्यक्ति भौतिक रजोगुण से दूषित व्यक्ति का निमंत्रण स्वीकार करता है, तो भोजन देने वाला व्यक्ति और उसे स्वीकार करने वाला व्यक्ति दोनों ही मानसिक रूप से दूषित हो जाते हैं।
 
“When a person accepts an invitation from someone contaminated by passion, both the one who offers the food and the one who accepts it become mentally polluted.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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