श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 6: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रघुनाथ दास गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 217
 
 
श्लोक  3.6.217 
एइ - मत सर्व - काल आछे व्यवहार ।
निष्किञ्चन भक्त खाड़ा हय सिंह - द्वार ॥217॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार यह सर्वकालिक प्रथा है कि जिस भक्त के पास जीवनयापन का कोई अन्य साधन नहीं होता, वह सेवकों से भिक्षा प्राप्त करने के लिए सिंहद्वार के द्वार पर खड़ा रहता है।
 
Thus it has always been the custom that a devotee who has no other support stands at the Singhdwar to receive alms from the servants.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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