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अध्याय 6: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रघुनाथ दास गोस्वामी की भेंट
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श्लोक 190
श्लोक
3.6.190
अङ्गनेते दूरे रहि’ करेन प्रणिपात ।
मुकुन्द - दत्त कहे , - ‘एइ आइल रघुनाथ’ ॥190॥
अनुवाद
आँगन में दूर खड़े होकर उन्होंने प्रणाम किया। तब मुकुंद दत्त ने कहा, "यह रघुनाथ हैं।"
Stopping a little distance away in the courtyard, he prostrated himself before them. Then Mukunda Dutta said, “Raghunath has arrived.”
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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