vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री चैतन्य चरितामृत
»
लीला 3: अन्त्य लीला
»
अध्याय 6: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रघुनाथ दास गोस्वामी की भेंट
»
श्लोक 114
श्लोक
3.6.114
दुइ भाइरे राघव आनि’ परिवेशे ।
यत्न करि’ खाओयाय, ना रहे अवशेषे ॥114॥
अनुवाद
राघव पंडित दोनों भाइयों के लिए प्रसाद लाते और बाँटते, उन्हें बड़े ध्यान से खिलाते। वे सब कुछ खा लेते थे, इसलिए कुछ भी बचा नहीं रहता था।
Raghav Pandit would bring the prasad and feed it to the two brothers with great care. They would eat it all, leaving nothing left.
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd