श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 6: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रघुनाथ दास गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  3.6.100 
एइ त कहि लुँ नित्यानन्देर विहार ।
‘चिड़ा - दधि - महोत्सव’ - नामे ख्याति यार ॥100॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार मैंने दही-चावल के उत्सव के संबंध में भगवान नित्यानंद प्रभु की लीलाओं का वर्णन किया है।
 
In this way I have described the pastimes of Nityananda Prabhu in connection with the Chida-Dahi Festival.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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