पूर्वम एवानुशिष्टेन विकला रस-लक्षणा
रसा एव रसाभा सा रसज्ञैरनुकीर्तिताः
स्युस्त्रिधो परसाश्चानु- रसाश्चापरसाश्च ते
उत्तमा मध्यमाः प्रोक्ताः कनिष्ठाश्चत्यमी क्रमात्
प्राप्तैः स्थायी विभावा नु- भावाद्या स्तु विरूपताम्
शान्तादयो रसा एव द्वादशो परसा मताः
भक्तादिभिर्विभावाद्यैः कृष्ण-संबंध वर्जितैः
रसा हास्यादयः सप्त शांत श्चानुर सा मताः
कृष्ण-तत्-प्रतिपक्षश्चेद विषयाश्रयतांगताः
हासादीनांतदा ते ऽत्र प्राज्ञैरपरसा मताः
भावाः सर्वे तदा भा सा रसा भा साश्च के चना
अमी प्रोक्त रसाभिज्ञैः सर्वेऽपि रसनाद्रसाः
"अतिरिक्त आनंद जो अस्थायी रूप से प्रगट हो लेकिन पहले बताए गए आनंद का खंडन करता हो और जिसमें आनंद की कुछ आवश्यकताओं का अभाव हो, उसे रसाभास या अतिव्याप्त आनंद कहा जाता है, जो उन्नत भक्तों द्वारा जाना जाता है जो यह जानते हैं कि अतिरिक्त आनंद का स्वाद कैसे लिया जाता है। ऐसे आनंद को उपरस (उप-आनंद), अनुरस (कृत्रिम अतिरिक्त आनंद) और अपरस (विरोधी अतिरिक्त आनंद) कहा जाता है। इस प्रकार, अतिरिक्त आनंद के अतिव्यापन को प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी या तृतीय श्रेणी के रूप में वर्णित किया गया है। जब बारह आनंद - जैसे तटस्थता, सेवाभाव और मित्रता - विपरीत स्थायी भाव, विभावा और अनुभाव की परमानंदता की विशेषता होते हैं, तो उन्हें उपरस या उप-आनंद के रूप में जाना जाता है। जब सात अप्रत्यक्ष अतिरिक्त आनंद और तटस्थता के शुष्क आनंद को भक्तों और मनोदशाओं द्वारा उत्पन्न किया जाता है जो सीधे कृष्ण से संबंधित नहीं होते हैं और उत्साही प्रेम में भक्ति सेवा, उन्हें अनुरस या नकली आनंद के रूप में वर्णित किया गया है। यदि कृष्ण और उनके प्रति विरोध की भावना रखने वाले शत्रु क्रमशः हँसी के आनंद की वस्तु और निवास हैं, तो परिणामी भावनाओं को अपरस या विरोधी आनंद कहा जाता है। एक आनंद को दूसरे आनंद से अलग करने वाले विशेषज्ञ कभी-कभी कुछ अतिव्याप्त अतिरिक्त आनंद (रसाभास) को रस के रूप में स्वीकार करते हैं क्योंकि वे आनंददायक और स्वादिष्ट होते हैं।" श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं, परस्पर-वैरयोर यदि योगस्तदा रसाभासः: "जब दो विरोधी अतिरिक्त आनंद अतिव्याप्त होते हैं, तो वे रसाभास या अतिरिक्त आनंद का अतिव्यापन उत्पन्न करते हैं।"
