श्री - चैतन्य - लीला एइ - अमृतेर सिन्धु ।
त्रिजगत् भासाइते पारे यार एक बिन्दु ॥88॥
Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु के कार्यकलाप अमृत सागर के समान हैं। इस सागर की एक बूँद भी तीनों लोकों को निमज्जित कर सकती है।
Sri Chaitanya Mahaprabhu's activities are like an ocean of nectar. Even a drop of this ocean can flood the three worlds.
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु के लीलाओं का उद्देश्य तीनों लोकों का अमृत से सिंचन करना है। यह कैसे संभव हो सकता है, इसका प्रदर्शन श्रील राघुनाथ दास गोस्वामी और बाद में ठाकुर नरोत्तम दास और श्यामानंद गोस्वामी ने किया, जो सभी श्री चैतन्य महाप्रभु की दया करते थे। अब वही दया कृष्ण भावना आंदोलन के माध्यम से सारे विश्व में व्याप्त हो रही है। वर्तमान कृष्ण भावना आंदोलन श्री चैतन्य महाप्रभु के लीलाओं से अलग नहीं है, जिसे उन्होंने उस समय निष्पादित किया जब वह व्यक्तिगत रूप से उपस्थित थे, क्योंकि वही सिद्धांतों का पालन किया जा रहा है और वही कार्य बिना किसी विफलता के निष्पादित किए जा रहे हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥