श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  3.5.88 
श्री - चैतन्य - लीला एइ - अमृतेर सिन्धु ।
त्रिजगत् भासाइते पारे यार एक बिन्दु ॥88॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु के कार्यकलाप अमृत सागर के समान हैं। इस सागर की एक बूँद भी तीनों लोकों को निमज्जित कर सकती है।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu's activities are like an ocean of nectar. Even a drop of this ocean can flood the three worlds.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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