श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  3.5.47 
उज्ज्वल मधुर प्रेम - भक्ति सेइ पाय ।
आनन्दे कृष्ण - माधुर्ये विहरे सदाय ॥47॥
 
 
अनुवाद
“कृष्ण के दिव्य, तेजोमय, मधुर आनंदमय प्रेम का आस्वादन करके, ऐसा व्यक्ति कृष्ण की लीलाओं की मधुरता के दिव्य आनंद में चौबीस घंटे जीवन का आनंद ले सकता है।
 
“Tasting the divine, radiant, sweet love of Krishna, such a person can enjoy the transcendental bliss of the sweetness of Krishna's pastimes twenty-four hours a day.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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