जब एक पवित्र वैष्णव श्रीमद्-भागवतम पर बोलता है और एक और पवित्र वैष्णव ऐसी एक आत्मा से श्रीमद्-भागवतम को सुनता है, तो वे दोनों आध्यात्मिक दुनिया में रहते हैं, जहां भौतिक प्रकृति के तरीकों का संदूषण उन्हें छू नहीं सकता है। प्रकृति के तरीकों के संदूषण से मुक्त होने पर, वक्ता और श्रोता एक आध्यात्मिक मानसिकता में तय किए जाते हैं, यह जानते हुए कि आध्यात्मिक मंच पर उनकी स्थिति सर्वोच्च भगवान की सेवा करना है। प्राकृत-सहजिया के रूप में जाना जाने वाले पुरुषों की कक्षा, जो भगवान कृष्ण के पारलौकिक शगलों को भौतिक क्षेत्र में एक पुरुष और एक महिला के व्यवहार की तरह मानते हैं, कृत्रिम रूप से सोचते हैं कि रास-लीला सुनने से उन्हें उनके रोगग्रस्त हृदयों की वासनाओं को कम करके उनकी मदद मिलेगी। लेकिन क्योंकि वे नियमन सिद्धांतों का पालन नहीं करते हैं, बल्कि साधारण नैतिकता का भी उल्लंघन करते हैं, रास-लीला पर उनका चिंतन एक निरर्थक प्रयास है, जिसके परिणामस्वरूप कभी-कभी गोपियों और भगवान कृष्ण के व्यवहार करते हैं। प्राकृत-सहजिया की ऐसी आदतों को मना करने के लिए, श्री चैतन्य महाप्रभु ने शब्द विश्वास ("विश्वास") का उपयोग करके अपनी भौतिक बुद्धि को बाहर रखा है। श्रीमद-भागवतम (10.33.30) में, श्रील शुकादेव गोस्वामी कहते हैं:
नैतत समकरेज जतु मनसापि ह्य नीश्वर
विनश्यत्य आचरन मौध्याद यथा रुद्रो ब्धिजम विषम
"निश्चित रूप से जो सर्वोच्च भगवान नहीं है, उसे अपने मन में भी कृष्ण के पारलौकिक रास-लीला की गतिविधियों की नकल नहीं करनी चाहिए। यदि अज्ञानता से कोई ऐसा करता है, तो वह नष्ट हो जाएगा, जैसे कि वह भगवान शिव की नकल कर रहा था, जिन्होंने महासागर से उत्पन्न जहर पिया था।
