श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  3.5.43 
ताँहार मनेर भाव तेंह जाने मात्र ।
ताहा जानिबारे आर द्वितीय नाहि पात्र ॥43॥
 
 
अनुवाद
“केवल वही, और कोई नहीं, उसके मन की स्थिति को समझ सकता है।
 
“Only they can understand their state of mind, no one else.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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