श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 35-36
 
 
श्लोक  3.5.35-36 
आमि त’ सन्यासी, आपनारे विरक्त क रि’ मानि ।
दर्शन रहु दूरे, ‘प्रकृतिर’ नाम यदि शुनि ॥35॥
तबहिं विकार पाय मोर तनु - मन ।
प्रकृति - दर्शने स्थिर हय को जन ? ॥36॥
 
 
अनुवाद
"मैं एक संन्यासी हूँ," उन्होंने कहा, "और मैं स्वयं को निश्चय ही त्यागी मानता हूँ। परन्तु स्त्री को देखने की तो बात ही क्या, यदि मैं स्त्री का नाम भी सुन लेता हूँ, तो मेरे मन और शरीर में परिवर्तन आ जाता है। अतः स्त्री को देखकर कौन अविचल रह सकता है? यह बहुत कठिन है।"
 
He said, "I am a sannyasi, and I certainly consider myself detached. But even hearing the name of a woman, let alone seeing one, causes me to feel disturbed in my body and mind. So who can remain unperturbed by the sight of a woman? It is very difficult."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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