क्योंकि जब श्री रामानंद राय लड़कियों की सेवा कर रहे थे तब व्यक्तिगत आत्मसंतुष्टि का कोई सवाल ही नहीं था, इसलिए उनका मन स्थिर था और शरीर अपरिवर्तित था। इसका अनुकरण नहीं किया जाना चाहिए, और न ही ऐसी मानसिकता श्री रामानंद राय के अलावा किसी के लिए संभव है, जैसा कि श्री चैतन्य महाप्रभु बताएंगे। श्री रामानंद राय का उदाहरण निश्चित रूप से अनूठा है। श्री चैतन्य-चरितामृत के लेखक ने यह विवरण दिया है क्योंकि पूर्ण भक्ति सेवा में कोई भी इस तरह का पद प्राप्त कर सकता है। फिर भी, इस विषय को बहुत गंभीरता से समझना चाहिए और ऐसी गतिविधियों की नकल करने का कभी प्रयास नहीं करना चाहिए।
