श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 162
 
 
श्लोक  3.5.162 
श्री - कृष्ण - चैतन्य - लीला - अमृतेर सार ।
एक - लीला - प्रवाहे वहे शत - शत धार ॥162॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ अमृत के समान हैं। उनकी एक लीला की धारा से सैकड़ों-हजारों शाखाएँ निकलती हैं।
 
The pastimes of Sri Krishna Chaitanya Mahaprabhu are the essence of nectar. Hundreds and thousands of branches flow from one of His pastimes.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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