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श्लोक 3.5.160  |
तार मध्ये कहि लुँ रामानन्देर महिमा ।
आपने श्री - मुखे प्रभु वर्णे याँर सीमा ॥160॥ |
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| अनुवाद |
| इस कथा में मैंने श्री रामानन्द राय के गौरवशाली चरित्रों का वर्णन किया है, जिनके माध्यम से श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं कृष्ण के प्रति परमानंद प्रेम की सीमाओं का वर्णन किया है। |
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| In the course of this story I have described the glorious qualities of Sri Ramanand Rai, through whom Sri Chaitanya Mahaprabhu himself has described the limits of Krishna-love. |
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