श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 134
 
 
श्लोक  3.5.134 
एइ श्लोक करियाछ पाञा सन्तोष ।
तोमार हृदयेर अर्थे दुँहाय लागे ‘दोष’ ॥134॥
 
 
अनुवाद
“आपने इस परिचयात्मक श्लोक की रचना बहुत ही संतुष्टि के साथ की है, किन्तु आपने जो अर्थ व्यक्त किया है, वह भगवान जगन्नाथ और श्री चैतन्य महाप्रभु दोनों के प्रति अपमान से दूषित है।
 
“Although you have composed this introductory verse with complete satisfaction, the meaning you have expressed is tainted with offense against both Jagannatha and Sri Chaitanya Mahaprabhu.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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