श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 132
 
 
श्लोक  3.5.132 
चैतन्येर भक्त - गणेर नित्य कर ‘सङ्ग’ ।
तबेत जानिबा सिद्धान्त - समुद्र - तरङ्ग ॥132॥
 
 
अनुवाद
स्वरूप दामोदर ने आगे कहा, "श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तों की नियमित संगति करो, तभी तुम भक्ति सागर की लहरों को समझ पाओगे।
 
Swarupa Damodara further said, “Associate regularly with the devotees of Sri Chaitanya Mahaprabhu, only then will you be able to understand the waves of the ocean of devotion.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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