चैतन्येर भक्त - गणेर नित्य कर ‘सङ्ग’ ।
तबेत जानिबा सिद्धान्त - समुद्र - तरङ्ग ॥132॥
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अनुवाद
स्वरूप दामोदर ने आगे कहा, "श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तों की नियमित संगति करो, तभी तुम भक्ति सागर की लहरों को समझ पाओगे।
Swarupa Damodara further said, “Associate regularly with the devotees of Sri Chaitanya Mahaprabhu, only then will you be able to understand the waves of the ocean of devotion.”
तात्पर्य
इस संदर्भ में स्पष्ट रूप से जानना आवश्यक है कि श्री चैतन्य महाप्रभु की भक्ति मार्ग के अनुयायी परम पुरुषोत्तम भगवान के सनातन सहचारी होते हैं तथा परमतत्व के परिपूर्ण ज्ञाता होते हैं। यदि कोई श्री चैतन्य महाप्रभु के परम भक्तों के साथ सहयोग करके तुरंत उनके सिद्धांतों का पालन करे तो भौतिक भोगों की काम वासना हृदय से दूर हो जाएगी। तभी कोई श्रीमद्भागवत के अर्थ को समझ पाएगा और उसे सुनने का उद्देश्य ज्ञात कर पाएगा। अन्यथा इस प्रकार की समझ असंभव है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥