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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 131
 
 
श्लोक  3.5.131 
याह, भागवत पड़ वैष्णवेर स्थाने ।
एकान्त आश्रय कर चैतन्य - चरणे ॥131॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने कहा, "यदि आप श्रीमद्भागवतम् को समझना चाहते हैं, तो आपको किसी आत्म-साक्षात्कारी वैष्णव के पास जाना होगा और उनसे सुनना होगा। ऐसा आप तभी कर सकते हैं जब आप पूरी तरह से श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की शरण में आ जाएँ।"
 
He said, "If you want to understand the Srimad Bhagavatam, you must go to a self-realized Vaishnava and listen to him. You can do this only when you take complete refuge in the lotus feet of Sri Chaitanya Mahaprabhu."
तात्पर्य
यहां पर स्वरूप दामोदर गोस्वामी बंगाल के कवि को निर्देश देते हैं कि वह श्रीमद भगवतम एक शुद्ध वैष्णव से सुनें और उनसे सीखें। विशेष रूप से भारत में, अब पेशेवर भागवतम पाठकों का एक वर्ग है जिनकी जीविका का साधन गाँव-गाँव जाकर, नगर-नगर जाकर भागवतम पढ़ना और दक्षिणा या पारितोषिक इकट्ठा करना है, जो कि धन या वस्तुओं के रूप में हो सकता है, जैसे छाते, कपड़े और फल। इस प्रकार अब भागवत व्यवसाय की एक प्रणाली बन गई है, जिसमें भागवत-सप्ताह नामक पाठ होते हैं जो एक सप्ताह तक चलते हैं, हालाँकि इसका उल्लेख श्रीमद भागवतम में नहीं है। श्रीमद भागवतम कहीं भी यह नहीं कहता है कि भागवतम को पेशेवरों से एक सप्ताह तक सुना जाना चाहिए। इसके बजाय, श्रीमद भागवतम (1.2.17) कहता है, श्रृण्वतां स्व-कथाः कृष्णः पुण्य-श्रवण-कीर्तनः: किसी को भी नियमित रूप से स्वयं-साक्षात्कृत वैष्णव से श्रीमद भागवतम सुनना चाहिए। ऐसे श्रवण से, व्यक्ति पवित्र हो जाता है: हृद्य अन्तः-स्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत् सताम्। जैसे-जैसे कोई व्यक्ति नियमित रूप से और ईमानदारी से भागवतम सुनता है, वैसे-वैसे उसका हृदय सभी भौतिक दूषणों से शुद्ध हो जाता है:

नष्ट-प्रायेष्वभद्रेषु नित्यं भागवत-सेवया

भगवत्युत्तम-श्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी

"भागवतम को नियमित रूप से सुनने और शुद्ध भक्त की सेवा करने से, हृदय के लिए जो भी परेशानी का कारण है वह लगभग पूरी तरह से नष्ट हो जाती है, और भगवान के व्यक्तित्व के प्रति प्रेम सेवा, जिसकी प्रशंसा पारलौकिक गीतों से की जाती है, एक अपरिवर्तनीय तथ्य के रूप में स्थापित हो जाती है।" (भाग. 1.2.18)

यह उचित प्रक्रिया है, लेकिन लोग पेशेवर भागवतम पाठकों द्वारा गुमराह किए जाने के आदी हैं। इसलिए स्वरूप दामोदर गोस्वामी यहाँ सलाह देते हैं कि किसी को भी पेशेवर पाठकों से श्रीमद भागवतम नहीं सुनना चाहिए। इसके बजाय, व्यक्ति को स्वयं-साक्षात्कृत वैष्णव से भागवतम सुनना और सीखना चाहिए। कभी-कभी यह देखा जाता है कि जब कोई मायावादी संन्यासी भागवतम पढ़ता है, तो पुरुषों की भीड़ शब्दों की छेड़छाड़ सुनने जाती है जो कृष्ण के प्रति उनके सुप्त प्रेम को नहीं जगा सकती है। कभी-कभी लोग पेशेवर नाटक देखने जाते हैं और कलाकारों को भोजन और धन देते हैं, जो इन भेंटों को बहुत अच्छी तरह से इकट्ठा करने में माहिर होते हैं। परिणाम यह होता है कि दर्शकों के सदस्य गृह अंध-कूप, पारिवारिक स्नेह की उसी स्थिति में बने रहते हैं, और कृष्ण के लिए उनके प्रेम को नहीं जगाते हैं।

भागवतम (7.5.30) में कहा गया है, मतित न कृष्णे परतः स्वतो वा मिथोऽभिपद्यते गृह-व्रतानाम्: गृह-व्रत, जो भौतिकवादी जीवन शैली का पालन करना जारी रखने के लिए दृढ़ हैं, वे कभी भी कृष्ण के अपने सुप्त प्रेम को नहीं जगाएँगे, क्योंकि वे भागवतम को केवल गृहस्थ जीवन में अपनी स्थिति को मजबूत करने और पारिवारिक मामलों और सेक्स में खुश रहने के लिए सुनते हैं। पेशेवरों से भागवतम सुनने की इस प्रक्रिया की निंदा करते हुए, स्वरूप दामोदर गोस्वामी कहते हैं, याह, भागवता पड़ वैष्णवेरा स्थाने: "श्रीमद भागवतम को समझने के लिए, आपको एक स्वयं-साक्षात्कृत वैष्णव के पास जाना चाहिए।" किसी को मायावादी या अन्य गैर-भक्त से भागवतम सुनने से कठोरता से बचना चाहिए जो केवल पाठ से कुछ अर्थ निकालने के लिए शब्दों की व्याकरणिक छेड़छाड़ करता है, भोली जनता से धन इकट्ठा करता है और इस तरह लोगों को अंधेरे में रखता है।

स्वरूप दामोदर गोस्वामी श्रीमद भागवतम के भौतिकवादी तथाकथित श्रोताओं के व्यवहार को सख्ती से प्रतिबंधित करते हैं। कृष्ण के लिए वास्तविक प्रेम को जगाने के बजाय, भागवतम के ऐसे श्रोता घर के कामों और यौन जीवन से अधिकाधिक जुड़ जाते हैं (यन मैथुनादि-गृहमेधी-सुखं हि तुच्छम)। श्रीमद भागवतम उस व्यक्ति से सुनना चाहिए जिसका भौतिक गतिविधियों से कोई संबंध नहीं है, या दूसरे शब्दों में, एक परमहंस वैष्णव से, जिसने संन्यास की उच्चतम अवस्था प्राप्त की है। बेशक, यह तब तक संभव नहीं है जब तक कोई श्री चैतन्य महाप्रभु के चरण कमलों की शरण नहीं लेता। श्रीमद भागवतम केवल उसी के लिए समझ में आता है जो श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणों का अनुसरण कर सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)