श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  3.5.127 
ह्लादिन्या सम्विदाश्लिष्टः सच्चिदानन्द - ईश्वरः ।
स्वाविद्या संवृतो जीवः सड्क्लेश - निकराकरः ॥127॥
 
 
अनुवाद
"परम नियन्ता भगवान सदैव दिव्य आनंद से परिपूर्ण रहते हैं और उनके साथ ह्लादिनी और संवित् नामक शक्तियाँ विद्यमान रहती हैं। तथापि, बद्धजीव सदैव अज्ञान से आच्छादित रहता है और जीवन के त्रिविध दुःखों से लज्जित होता है। इस प्रकार वह सभी प्रकार के क्लेशों का भण्डार है।"
 
"The Supreme Controller, the Supreme Personality of Godhead, is always filled with transcendental bliss and is endowed with the powers called hladini and samvit. But the conditioned soul is always covered with ignorance and is troubled by the three afflictions of life. Thus, he is the reservoir of all kinds of afflictions."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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