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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 122
 
 
श्लोक  3.5.122 
ईश्वरेर नाहि कभु देह - देहि - भेद ।
स्वरूप, देह, - चिदानन्द, नाहिक विभेद ॥122॥
 
 
अनुवाद
"परम पुरुषोत्तम भगवान के शरीर और आत्मा में कभी कोई भेद नहीं होता। उनकी व्यक्तिगत पहचान और उनका शरीर आनंदमय आध्यात्मिक ऊर्जा से बने हैं। उनमें कोई भेद नहीं है।"
 
"There is never any difference between the body and soul of the Supreme Personality of Godhead. His form and body are made of blissful spiritual energy (chidananda). There is no difference between them.
तात्पर्य
भगवान कृष्ण, नंद महाराज के पुत्र, अव्यय-ज्ञान है; दूसरे शब्दों में, उनके शरीर और उनकी आत्मा में कोई भेद नहीं है, क्योंकि उनका अस्तित्व पूरी तरह से आध्यात्मिक है। श्रीमद्-भगवतम में वर्णित पद के अनुसार जो वदंती तत तत्त्व-विदस् तत्त्वम् (1.2.11) से आरम्भ होता है, परम् तत्व को हमेशा त्रिआयामी दृष्टिकोण से ब्रह्म, परमात्मा और भगवान के रूप में समझना चाहिए। हालाँकि, भौतिक जगत की वस्तुओं के विपरीत, परम तत्व हमेशा एक रहता है और हमेशा एक जैसा ही रहता है। इस प्रकार उनके शरीर और उनकी आत्मा के बीच कोई भिन्नता नहीं है। इसलिए, उनका रूप, नाम, गुण और लीलाएँ भौतिक जगत से पूरी तरह से अलग हैं। व्यक्ति को अच्छी तरह से पता होना चाहिए कि परम व्यक्तित्व भगवान के शरीर और आत्मा के बीच कोई भेद नहीं है। जब कोई उनके शरीर और उनकी आत्मा के बीच भेद की कल्पना करता है, तो उसे तुरंत भौतिक प्रकृति द्वारा नियंत्रित कर लिया जाता है। क्योंकि भौतिक जगत में एक व्यक्ति इस प्रकार का भेद करता है, इसलिए उसे बद्ध-जीव, एक नियंत्रित आत्मा कहा जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)