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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 120
 
 
श्लोक  3.5.120 
दुइ - ठाञि अपराधे पाइबि दुर्गति! ।
अतत्त्व - ज्ञ ‘तत्त्व’ वर्णे, तार एइ रीति! ॥120॥
 
 
अनुवाद
स्वरूप दामोदर ने आगे कहा, "क्योंकि तुमने भगवान जगन्नाथ और श्री चैतन्य महाप्रभु का अपमान किया है, इसलिए तुम्हें नरक की प्राप्ति होगी। तुम परम सत्य का वर्णन करना नहीं जानते, फिर भी तुमने ऐसा करने का प्रयास किया है। इसलिए तुम्हारी निंदा अवश्य होनी चाहिए।"
 
Svarupa Damodara continued, "Since you have committed a crime against Lord Jagannatha and Sri Chaitanya Mahaprabhu, you will go to hell. You do not even know how to describe the Absolute Truth, yet you have attempted to do so. Therefore, you are cursed."
तात्पर्य
स्वरूप दामोदर गोस्वामी की दृष्टि में बंगाल के ब्राह्मण कवि अपराधी थे, क्योंकि कवि को पूर्ण सत्य का ज्ञान नहीं था, फिर भी उन्होंने इसका वर्णन करने का प्रयास किया था। बंगाली कवि श्री चैतन्य महाप्रभु और भगवान जगन्नाथ दोनों के अपराधी थे। क्योंकि उन्होंने भगवान जगन्नाथ के शरीर और उनकी आत्मा के बीच भेद किया था और क्योंकि उन्होंने संकेत दिया था कि भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान जगन्नाथ से अलग थे, उन्होंने उन दोनों के लिए अपराध किए थे। अ-तत्व-ज्ञ उस व्यक्ति को संदर्भित करता है जिसे पूर्ण सत्य का ज्ञान नहीं होता है या जो अपने शरीर को ईश्वर के रूप में पूजता है। यदि एक अहंकारोपासक-मायावादी व्यक्ति, भोग-क्रिया में लगा हुआ व्यक्ति या केवल इंद्रिय तुष्टि में इच्छुक व्यक्ति पूर्ण सत्य का वर्णन करता है, तो वह तुरंत अपराधी बन जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)