ममैवांशो जीव्-लोके जीवभूतः सनातनः
मनः षष्ठानींद्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति
"इस सांसारिक जीवन में जीव मेरे ही नित्य अंश हैं। सांसारिक जीवन के कारण, वे मन की संधि छह इंद्रियों के साथ मिलकर बेहद कठिन संघर्ष कर रहे हैं।"
भौतिक रूप में मौजूद जीव के शरीर और आत्मा में अंतर होता है, किंतु क्योंकि श्री चैतन्य महाप्रभु और भगवान जगन्नाथ के भौतिक शरीर नहीं हैं, इसलिए उनके शरीर और आत्माओं के बीच कोई अंतर नहीं है। आध्यात्मिक क्षेत्र में, शरीर और आत्मा एकसमान हैं, उनमें कोई अंतर नहीं है। जैसा कि श्रीमद्-भागवतम् (1.11.38) में कहा गया है:
एतदीशनम ईशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः
न युज्यते सदात्मस्थैर्यथा बुद्धिस् तदाश्रया
"भगवान की यही दिव्यता है। यद्यपि वे भौतिक प्रकृति के गुणों के संपर्क में हैं, फिर भी वे भौतिक प्रकृति के गुणों से प्रभावित नहीं होते हैं। इसी प्रकार, जो भक्त भगवान की शरण ले चुके हैं, वे भौतिक गुणों से प्रभावित नहीं हो सकते।" भगवान श्री कृष्ण, भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव से अप्रभावित हैं। वास्तव में, उनके भक्त भी बाहरी ऊर्जा के प्रभाव से अप्रभावित हैं क्योंकि वे भगवान की सेवा में लगे रहते हैं। यहाँ तक कि एक भक्त का शरीर भी आध्यात्मिक हो जाता है, जैसे कि आग में डाली गई एक लोहे की छड़ आग की तरह ही योग्य बन जाती है क्योंकि यह लाल हो जाती है और जो कुछ भी इसे छूता है उसे तुरंत जला देती है। इसलिए बंगाल के कवि ने भगवान जगन्नाथ के शरीर और भगवान जगन्नाथ, भगवान को दो अलग-अलग संस्थाओं, भौतिक और आध्यात्मिक के रूप में व्यवहार करके, जैसे कि भगवान एक साधारण जीव थे, एक बड़ा अपराध किया। भगवान हमेशा भौतिक ऊर्जा के स्वामी हैं; इसलिए वे एक साधारण जीव की तरह भौतिक ऊर्जा से ढके रहने के लिए प्रेरित नहीं हैं।
