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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 119
 
 
श्लोक  3.5.119 
पूर्ण - घडू - ऐश्वर्य चैतन्य - स्वयं भगवान् ।
ताँरे कैलि क्षुद्र जीव स्फुलिङ्ग समान!! ॥119॥
 
 
अनुवाद
"आपने श्री चैतन्य महाप्रभु को, जो छह ऐश्वर्यों से परिपूर्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान हैं, एक साधारण जीव के स्तर का मान लिया है। उन्हें परम अग्नि के रूप में जानने के बजाय, आपने उन्हें एक चिंगारी के रूप में स्वीकार कर लिया है।"
 
"You have described Sri Chaitanya Mahaprabhu, the Supreme Personality of Godhead, endowed with the six opulences, as being of the level of an ordinary living entity. Instead of recognizing Him as the Supreme Fire, you have considered Him to be a spark."
तात्पर्य
उपनिषदों में कहा गया है, यथाग्नेर् विस्फुलिंगा व्युच्चरन्ति: जीव स्वरूप अग्नि की चिनगारियों की भाँति हैं और भगवान श्रीमद् भगवान मूल तेजस्वी महान अग्नि माने गए हैं। जब हम इस श्रुति-वाक्य या वेद के संदेश को सुनते हैं, तो हमें भगवान श्री कृष्ण और जीव-स्वरूप के बीच के अंतर को समझना चाहिए। परंतु, बाह्य ऊर्जा के नियंत्रण में रहने वाले व्यक्ति उस अंतर को नहीं समझ सकते। ऐसा व्यक्ति यह नहीं समझ सकता कि भगवान मूल महान अग्नि हैं, जबकि जीव-स्वरूप महज उस भगवान के छोटे-छोटे अंश मात्र हैं। जैसा कि कृष्ण ने भगवद् गीता (15.7) में कहा है:

ममैवांशो जीव्‍-लोके जीवभूतः सनातनः

मनः षष्ठानींद्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति

"इस सांसारिक जीवन में जीव मेरे ही नित्य अंश हैं। सांसारिक जीवन के कारण, वे मन की संधि छह इंद्रियों के साथ मिलकर बेहद कठिन संघर्ष कर रहे हैं।"

भौतिक रूप में मौजूद जीव के शरीर और आत्मा में अंतर होता है, किंतु क्योंकि श्री चैतन्य महाप्रभु और भगवान जगन्नाथ के भौतिक शरीर नहीं हैं, इसलिए उनके शरीर और आत्माओं के बीच कोई अंतर नहीं है। आध्यात्मिक क्षेत्र में, शरीर और आत्मा एकसमान हैं, उनमें कोई अंतर नहीं है। जैसा कि श्रीमद्-भागवतम् (1.11.38) में कहा गया है:

एतदीशनम ईशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः

न युज्यते सदात्मस्थैर्यथा बुद्धिस् तदाश्रया

"भगवान की यही दिव्यता है। यद्यपि वे भौतिक प्रकृति के गुणों के संपर्क में हैं, फिर भी वे भौतिक प्रकृति के गुणों से प्रभावित नहीं होते हैं। इसी प्रकार, जो भक्त भगवान की शरण ले चुके हैं, वे भौतिक गुणों से प्रभावित नहीं हो सकते।" भगवान श्री कृष्ण, भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव से अप्रभावित हैं। वास्तव में, उनके भक्त भी बाहरी ऊर्जा के प्रभाव से अप्रभावित हैं क्योंकि वे भगवान की सेवा में लगे रहते हैं। यहाँ तक कि एक भक्त का शरीर भी आध्यात्मिक हो जाता है, जैसे कि आग में डाली गई एक लोहे की छड़ आग की तरह ही योग्य बन जाती है क्योंकि यह लाल हो जाती है और जो कुछ भी इसे छूता है उसे तुरंत जला देती है। इसलिए बंगाल के कवि ने भगवान जगन्नाथ के शरीर और भगवान जगन्नाथ, भगवान को दो अलग-अलग संस्थाओं, भौतिक और आध्यात्मिक के रूप में व्यवहार करके, जैसे कि भगवान एक साधारण जीव थे, एक बड़ा अपराध किया। भगवान हमेशा भौतिक ऊर्जा के स्वामी हैं; इसलिए वे एक साधारण जीव की तरह भौतिक ऊर्जा से ढके रहने के लिए प्रेरित नहीं हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)