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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 118
 
 
श्लोक  3.5.118 
पूर्णानन्द - चित्स्वरूप जगन्नाथ - राय ।
ताँरे कैलि जड़ - नश्वर - प्राकृत - काय!! ॥118॥
 
 
अनुवाद
“भगवान जगन्नाथ पूर्णतः आध्यात्मिक हैं और दिव्य आनंद से परिपूर्ण हैं, किन्तु आपने उनकी तुलना भगवान की जड़, बाह्य ऊर्जा से बने एक नीरस, नाशवान शरीर से की है।
 
“Lord Jagannatha is completely spiritual and full of transcendental bliss, but you have compared Him to an inert, perishable body, which is made of the inert external energy of the Lord.”
तात्पर्य
यदि कोई सोचता है कि भगवान जगन्नाथ की मूर्ति लकड़ी से बनी मूर्ति है, तो वह तुरंत अपने जीवन में दुर्भाग्य लाता है। पद्म पुराण के अनुसार, "अर्चये विष्णौ शिला-धीः...ये वं नारकी सः": " जो भी मंदिर में देवता को पत्थर या लकड़ी से बना हुआ मानता है, वह नरक का निवासी है।" इस प्रकार जो कोई भी सोचता है कि भगवान जगन्नाथ का शरीर पदार्थ से बना है और जो भगवान जगन्नाथ के शरीर और उनकी आत्मा के बीच अंतर करता है, वह निंदनीय है, क्योंकि वह एक अपराधी है। एक शुद्ध भक्त जो कृष्ण चेतना के विज्ञान को जानता है, वह भगवान जगन्नाथ और उनके शरीर के बीच कोई अंतर नहीं करता है। वह जानता है कि वे एक हैं, जैसे भगवान कृष्ण और उनकी आत्मा एक हैं। जब आध्यात्मिक मंच पर की गई भक्ति सेवा से किसी की आँखें शुद्ध हो जाती हैं, तो वह वास्तव में भगवान जगन्नाथ और उनके शरीर को पूरी तरह से आध्यात्मिक रूप से देख सकता है। इसलिए, उन्नत भक्त पूजा करने योग्य देवता को एक साधारण इंसान की तरह शरीर के अंदर एक आत्मा के रूप में नहीं देखता है। भगवान जगन्नाथ के शरीर और आत्मा में कोई अंतर नहीं है, क्योंकि भगवान जगन्नाथ सच्चिदानंद-विग्रह हैं, जैसे कृष्ण का शरीर सच्चिदानंद-विग्रह है। वास्तव में भगवान जगन्नाथ और श्री चैतन्य महाप्रभु में कोई अंतर नहीं है, लेकिन बंगाल के अज्ञानी कवि ने भगवान जगन्नाथ के शरीर के लिए एक भौतिक भेद लागू किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)