श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 115
 
 
श्लोक  3.5.115 
सहजे ज ड़ - जगतेर चेतन कराइते ।
नीलाचले महाप्रभु हैला आविर्भूते ॥115॥
 
 
अनुवाद
“श्री चैतन्य महाप्रभु सम्पूर्ण नीरस भौतिक जगत को आध्यात्मिक बनाने के लिए नीलचल [जगन्नाथ पुरी] में प्रकट हुए हैं।”
 
“Sri Chaitanya Mahaprabhu has appeared here at Nilachal (Jagannath Puri) to spiritualize the entire material world.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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