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श्लोक 3.5.103  |
‘रस’, ‘रसाभास’ यार नाहिक विचार ।
भक्ति - सिद्धान्त - सिन्धु नाहि पाय पार ॥103॥ |
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| अनुवाद |
| "एक तथाकथित कवि जिसे दिव्य मधुरता और दिव्य मधुरता के अतिव्यापन का ज्ञान नहीं है, वह भक्ति सेवा के निष्कर्षों के सागर को पार नहीं कर सकता। |
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| A poet who does not have knowledge of the divine rasas and their transcendence cannot cross the ocean of the principle of devotion. |
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