श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 103
 
 
श्लोक  3.5.103 
‘रस’, ‘रसाभास’ यार नाहिक विचार ।
भक्ति - सिद्धान्त - सिन्धु नाहि पाय पार ॥103॥
 
 
अनुवाद
"एक तथाकथित कवि जिसे दिव्य मधुरता और दिव्य मधुरता के अतिव्यापन का ज्ञान नहीं है, वह भक्ति सेवा के निष्कर्षों के सागर को पार नहीं कर सकता।
 
A poet who does not have knowledge of the divine rasas and their transcendence cannot cross the ocean of the principle of devotion.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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