श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  3.5.102 
‘यद्वा - तद्वा’ कविर वाक्ये हय ‘रसाभास’ ।
सिद्धान्त - विरुद्ध शुनिते ना हय उल्लास ॥102॥
 
 
अनुवाद
"तथाकथित कवियों की रचनाओं में प्रायः पारलौकिक मधुरता का एक-दूसरे पर अतिव्याप्त होने की संभावना रहती है। जब मधुरता निर्णायक समझ के विरुद्ध जाती है, तो कोई भी ऐसी कविता सुनना पसंद नहीं करता।"
 
"The works of so-called poets are generally susceptible to transgression of the divine rasas (rasabhasa). When the rasas go against the principles, no one likes to listen to such poetry."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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