श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 101
 
 
श्लोक  3.5.101 
स्वरूप कहे , - “तुमि ‘गोप’ परम - उदार ।
ये - से शास्त्र शुनिते इच्छा उपजे तोमार” ॥101॥
 
 
अनुवाद
स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने उत्तर दिया, "प्रिय भगवान आचार्य, आप बहुत उदार ग्वालबाल हैं। कभी-कभी आपके भीतर किसी भी प्रकार की कविता सुनने की इच्छा जागृत हो जाती है। आप किसी भी प्रकार की कविता सुनने के लिए उत्सुक रहते हैं।"
 
Svarupa Damodara Goswami replied, "O Lord Acharya, you are a very generous cowherd. Sometimes you feel a desire to listen to any kind of poetry."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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