श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.5.10 
धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेन - कथासु यः ।
नोत्पादयेद् यदि रतिं श्रम एव हि केवलम् ॥10॥
 
 
अनुवाद
“‘जो व्यक्ति वर्ण और आश्रम के अनुसार अपने नियमित कर्तव्यों का पालन करता है, किन्तु कृष्ण के प्रति अपनी सुप्त आसक्ति को विकसित नहीं करता, अथवा कृष्ण के श्रवण और कीर्तन के प्रति अपनी रुचि को जागृत नहीं करता, वह निश्चित रूप से निष्फल परिश्रम कर रहा है।’”
 
“One who properly performs the rituals according to the Varnashrama system, but does not cultivate the latent love for Krishna or develop an interest in hearing and singing about Krishna, labors in vain.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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