श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 98
 
 
श्लोक  3.4.98 
आमार एइ देह प्रभुर कार्ये ना लागिल ।
भारत - भूमिते जन्मि’ एइ देह व्यर्थ हैल ॥98॥
 
 
अनुवाद
"मेरा शरीर श्री चैतन्य महाप्रभु की सेवा में उपयोग नहीं हो सका। इसलिए यद्यपि इसका जन्म भारत भूमि में हुआ, यह शरीर व्यर्थ हो गया।"
 
"My body could not be of any use in the service of Sri Chaitanya Mahaprabhu. Therefore, despite being born in India, this body was wasted."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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