श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  3.4.88 
“परेर स्थाप्य द्रव्य केह ना खाय, विलाय ।
निषेधिह इँहारे , - येन ना करे अन्याय” ॥88॥
 
 
अनुवाद
"जिस व्यक्ति को किसी दूसरे की संपत्ति सौंपी जाती है, वह उसे न तो बाँटता है और न ही अपने कामों के लिए इस्तेमाल करता है। इसलिए उसे समझाइए कि वह ऐसा कोई गैरकानूनी काम न करे।"
 
“He who is entrusted with someone else's wealth neither distributes it nor uses it for his own use.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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