श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  3.4.86 
यारे यैछे नाचाओ, से तैछे करे नर्तने ।
कैछे नाचे, केबा नाचाय, सेह नाहि जाने” ॥86॥
 
 
अनुवाद
"मेरे प्रिय प्रभु, आप जैसे किसी को नचाते हैं, वह वैसे ही नाचता है, परन्तु वह कैसे नाचता है और कौन उसे नचा रहा है, यह वह नहीं जानता।"
 
“O Lord, man dances according to the way You make him dance, but he does not know how he dances and who makes him dance.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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