श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  3.4.84 
तबे सनातन कहे , - “तोमाके नमस्कारे ।
तोमार गम्भीर हृदय के बुझिते पारे?” ॥84॥
 
 
अनुवाद
उस समय सनातन गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु से कहा, "मैं आपको सादर प्रणाम करता हूँ। आपके हृदय में जो गहन विचार हैं, उन्हें कोई नहीं समझ सकता।"
 
At that time Sanatana Goswami said to Sri Chaitanya Mahaprabhu, "I offer my respectful obeisances unto You. No one can understand the profound thoughts You contemplate within Your heart.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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