श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  3.4.83 
एत सब कर्म आमि ये - देहे करिमु ।
ताहा छाड़िते चाह तुमि, केमने सहिमु? ॥83॥
 
 
अनुवाद
"मुझे तुम्हारे शरीर के ज़रिए ये सारा काम करना है, लेकिन तुम इसे छोड़ना चाहती हो। मैं ये कैसे बर्दाश्त कर सकती हूँ?"
 
"I have to do all this work through your body, but you want to abandon it. How can I bear this?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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