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श्लोक 3.4.82  |
मातार आज्ञाय आमि व सि नीलाचले ।
ताहाँ ‘धर्म’ शिखाइते नाहि निज - बले ॥82॥ |
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| अनुवाद |
| “मैं अपनी माता की आज्ञा से यहाँ जगन्नाथपुरी में बैठा हूँ; इसलिए मैं मथुरा-वृन्दावन जाकर लोगों को धार्मिक सिद्धांतों के अनुसार जीवन जीने की शिक्षा नहीं दे सकता। |
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| “I am staying in Jagannatha Puri by the order of my mother, hence I cannot go to Mathura-Vrindavan to teach people how to live according to religious principles. |
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