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श्लोक 3.4.77  |
परेर द्रव्य तुमि केने चाह विनाशिते? ।
धर्माधर्म विचार किबा ना पार करिते ? ॥77॥ |
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| अनुवाद |
| "तुम किसी और की संपत्ति क्यों नष्ट करना चाहते हो? क्या तुम सही और गलत का विचार नहीं कर सकते?" |
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| "Why do you want to destroy someone else's property? Can't you discern what is right and what is wrong?" |
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