श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  3.4.77 
परेर द्रव्य तुमि केने चाह विनाशिते? ।
धर्माधर्म विचार किबा ना पार करिते ? ॥77॥
 
 
अनुवाद
"तुम किसी और की संपत्ति क्यों नष्ट करना चाहते हो? क्या तुम सही और गलत का विचार नहीं कर सकते?"
 
"Why do you want to destroy someone else's property? Can't you discern what is right and what is wrong?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)