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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  3.4.70 
भजनेर मध्ये श्रेष्ठ नव - विधा भक्ति ।
“कृष्ण - प्रेम”, ‘कृष्ण’ दिते धरे महा - शक्ति ॥70॥
 
 
अनुवाद
भक्ति सेवा करने के तरीकों में, नौ निर्धारित विधियाँ सर्वोत्तम हैं, क्योंकि इन प्रक्रियाओं में कृष्ण को प्राप्त करने और उनके प्रति परमानंद प्रेम उत्पन्न करने की महान शक्ति है।
 
“Among the methods of devotional service, the nine recommended methods are the best, because they contain the great power to bestow love for Krishna and for Him.”
तात्पर्य
श्रीमद् भागवत (७.५.२३) में नौ प्रकार की भक्ति बताई गई है:

श्रवणम् कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाण्ड सेवनम्

अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यं आत्म निवेदनम्

ये नौ प्रकार हैं: कृष्ण के बारे में सुनना, भजन-कीर्तन करना, कृष्ण के बारे में याद करना, कृष्ण के चरणों की सेवा करना, मंदिर में पूजा करना, प्रार्थना करना, नौकर की तरह सेवा करना, कृष्ण से दोस्ती करना और निःस्वार्थ भाव से कृष्ण को समर्पण करना। भक्ति की ये नौ प्रक्रियाएँ कृष्ण और उनके प्रेम में ला सकती हैं। शुरू में व्यक्ति नियमों के अनुसार भक्ति करनी पड़ती है, लेकिन जैसे-जैसे भक्ति ही जीवन हो जाती है, धीरे-धीरे कृष्ण के लिए परमानंद प्रेम की प्राप्ति हो जाती है। अंततः, कृष्ण ही जीवन का लक्ष्य हैं। कृष्ण के चरणों को पाने के लिए ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने की आवश्यकता नहीं है, और न ही निम्न परिवार में जन्मा व्यक्ति कृष्ण के चरणों को प्राप्त करने के लिए अयोग्य होता है। श्रीमद् भागवत (३.३३.७) में देवहूति, कपिलदेव से कहती हैं:

अहो बत श्वपचो अतो गरीयान्

यज् जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्

तेपुस तप ते जुहुवुः ससनुर आर्या

ब्रह्मानूचुर नाम गृणन्ति ये ते

"हे मेरे भगवान, कुत्तों को खाने वाले परिवार में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी महान है यदि वह हमेशा भगवान का पवित्र नाम जपता है। ऐसा व्यक्ति पहले से ही सभी तरह की तपस्या, यज्ञ और वैदिक यज्ञ कर चुका है, पहले से ही पवित्र नदियों में स्नान कर चुका है, और सभी वैदिक साहित्य का अध्ययन भी कर चुका है। इस प्रकार वह एक महान व्यक्तित्व बन गया है।" इसी तरह, कुन्तीदेवी भगवान कृष्ण से कहती हैं:

जन्मैश्वर्य श्रुतश्रीभिर् एधमान मदः पुमान

नैवारहत्यभिधातुं वै त्वाम अकिंचन गोचरम्

"जो व्यक्ति अपने जन्म, धन, ज्ञान और सौन्दर्य पर गर्व करता है, वह आपके चरणों को प्राप्त नहीं कर सकता। आप केवल विनम्र और नम्र लोगों के लिए उपलब्ध हैं, अभिमानियों के लिए नहीं।" (भाग. १.८.२६)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)