श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 69
 
 
श्लोक  3.4.69 
विप्राद् द्वि - षड् - गुण - युतादरविन्द - नाभ - पादारविन्द - विमुखात् श्रुपचं वरिष्ठम् ।
मन्ये तदर्पत - मनो - वचनेहितार्थ - प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरि - मानः ॥69॥
 
 
अनुवाद
“‘कोई व्यक्ति ब्राह्मण कुल में जन्म ले सकता है और उसमें सभी बारह ब्राह्मणीय गुण हो सकते हैं, किन्तु यदि वह इन गुणों से युक्त होने पर भी भगवान कृष्ण के चरणकमलों में समर्पित नहीं है, जिनकी नाभि कमल के समान है, तो वह उस चाण्डाल के समान नहीं है जिसने अपना मन, वचन, कर्म, धन और जीवन भगवान की सेवा में समर्पित कर दिया है। केवल ब्राह्मण कुल में जन्म लेना या ब्राह्मणीय गुण होना पर्याप्त नहीं है। व्यक्ति को भगवान का शुद्ध भक्त होना चाहिए। अतः यदि कोई श्वा-पच या चाण्डाल भक्त है, तो वह न केवल अपना, बल्कि अपने पूरे परिवार का उद्धार करता है, जबकि एक ब्राह्मण जो भक्त नहीं है, किन्तु केवल ब्राह्मणीय योग्यता रखता है, वह स्वयं को भी शुद्ध नहीं कर सकता, अपने परिवार की तो बात ही क्या।’
 
"Even if someone is born in a Brahmin family and possesses all the twelve Brahmin qualities, but despite being so capable, if he does not surrender himself to the lotus feet of Lord Krishna, the lotus-naveled one, he is not even like a Chandala who has dedicated his mind, words, actions, wealth, and life to the service of the Lord. Merely being born in a Brahmin family or possessing Brahmin qualities is not enough. One must be a devotee of the Lord. In this way, if a Shvapach or Chandala is a devotee, he not only liberates himself but also his entire family. Whereas a Brahmin who is not a devotee but possesses only Brahmin qualities cannot purify even himself, let alone his family."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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