श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  3.4.65 
कुबुद्धि छाड़िया कर श्रवण - कीर्तन ।
अचिरात् पाबे तबे कृष्णेर चरण ॥65॥
 
 
अनुवाद
चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी से कहा, "अपनी सभी निरर्थक इच्छाओं का त्याग कर दो, क्योंकि वे कृष्ण के चरणकमलों की शरण पाने के लिए प्रतिकूल हैं। जप और श्रवण में लग जाओ। तब तुम्हें निस्संदेह शीघ्र ही कृष्ण की शरण प्राप्त होगी।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu told Sanatana Goswami, "Give up all your vain desires, for they are unsuitable for seeking refuge at the lotus feet of Krishna. Engage yourself in hearing and chanting. Then you will immediately, without any doubt, seek refuge in Krishna."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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