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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  3.4.64 
सिञ्चाङ्ग नस्त्वदधरामृत - पूरकेण हासावलोक - कल - गीत - ज - हृच्छयाग्निम् ।
नो चेद्वयं विरह - जाग्न्युपयुक्त - देहा ध्यानेन याम पदयोः पदवीं सखे ते ॥64॥
 
 
अनुवाद
"हे कृष्ण, अपनी मुस्कुराती हुई दृष्टि और मधुर वाणी से आपने हमारे हृदय में काम-अग्नि जगा दी है। अब आप हमें चूमकर अपने होठों से अमृत की धारा बहाकर उस अग्नि को बुझा दें। कृपया ऐसा करें। अन्यथा, हे मित्र, आपके वियोग में हमारे हृदय की अग्नि हमारे शरीर को जलाकर राख कर देगी। इस प्रकार ध्यान द्वारा हम आपके चरणकमलों की शरण ग्रहण करेंगे।"
 
"O dear Krishna, you have kindled the fire of lust in our hearts with your smiling glances and sweet words. Now you must extinguish this fire by kissing us with the nectar of your lips. Please do so. Otherwise, my friend, the fire within our hearts caused by your separation will corrode our bodies. In this way, through meditation, we will find refuge in your lotus feet."
तात्पर्य
यह श्लोक (भागवत 10.29.35) गोपियों ने उस समय बोला था जब वे पतझड़ की चाँदनी में कृष्ण की बाँसुरी की धुन से आकर्षित हो गई थीं। वे सब मदमस्त होकर कृष्ण के पास आईं, पर उनके प्रेम को और आनंदमय बनाने के लिए कृष्ण ने उन्हें घर वापस लौट जाने का नैतिक उपदेश दिया। गोपियों ने इन उपदेशों की परवाह नहीं की। वे कृष्ण से चुंबन चाहती थीं, क्योंकि वे वहाँ उनके साथ नृत्य करने की आसक्ति भरी इच्छा से आई थीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)